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एक जन्माष्टमी ऐसी भी

निराश्रित बालपन एक दयनीय विवशता है समाज के लिए। और इसे पनाह देने वाली संस्थाएं व व्यक्ति अन्यन्त आदरणीय है। ऐसा ही भाव लिये यह निराश्रित बालगृह में आते-आते एक दिन हमने वहां के मासूम बच्चों में कृष्ण की छवि देखी। जब यह ज्ञात हुआ कि इन बालकों का जन्मदिन कभी मनाया नही गया तब हमने उन नन्हंे गोपालों का जन्मदिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मनाने का संकल्प किया।

बस उसी दिन से जैसे प्रभु कृपा बरसने लगी। माता-पिता व गुरूजनों ने आशीर्वाद दिया। मित्रों, सम्बन्धियों व परिचितों ने प्रशंसा व सहयोग दिया। सभी उतावले थे और आश्यर्चचकित भी कि ऐसा उन्होंने पहले कभी क्यों नही सोचा। प्रतिदिन अनेकानेक व्यक्ति अनाथालयों में जाते हैं, अपने या पोते-पोतियों के जन्मदिन का केक काटकर उन बच्चों में दयापर्वूक बांटते हैं, किन्तु उन सूनी आखों के असंख्य भावों को समझ नहीं पाते। अपलक देखती वे आखें एक बार उस मोमबत्ती को फूंकना चाहती हैं। एक बार वे अपने लिये ‘हैप्पी बर्थ डे टू यू’ सुनना चाहते थे। जन्माष्टमी आयी। बाल रूपी ईश्वर के निमित्त किये कार्य सार्थक हुए। भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान व पूजा के साथ उत्सव आरम्भ हुआ। किन्तु वर्षों की ताड़ना व मायूसी से दबे बच्चे हंस नहीं पा रहे थे। मैंने फूलों से सजे झूले पर विराजमान मूर्तरूप बाल कृष्ण को देखा। मुरली की ओट में छिपे कमल अधरों पर दिव्य मुस्कान थी। अन्तर्मन से आवाज आयी, ‘हे दीनानाथ, इन बच्चों के पास आप ही के समान मोरपंख व बांसुरी हैं, आप का ही प्रतिबिम्ब हैं ये बालक, तो फिर यह विषमता क्यों? आपके अधरों की मुस्कान इनके होठों पर क्यों नही?’